कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर विशेष साहित्यिक विमर्श

May 9, 2026 - 21:44
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कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर विशेष साहित्यिक विमर्श
कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर विशेष साहित्यिक विमर्श

कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर विशेष साहित्यिक विमर्श

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कम शब्दों में कहें तो, कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पांचवीं पुण्यतिथि पर एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

राजकीय महाविद्यालय मालधनचौड़ में विशिष्ट समारोह

रामनगर। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एवं कुमाउनी साहित्य के विद्वान मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि मनाने के लिए राजकीय महाविद्यालय मालधनचौड़ में दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर, विद्वानों और साहित्य प्रेमियों ने मठपाल के अद्वितीय योगदान पर चर्चा की। कार्यक्रम में 'दुदबोलि' पत्रिका के नवीनतम अंक 'हमरि लोक-थात' का विमोचन भी किया गया, जो उत्तराखंड की लोक परंपराओं को समर्पित है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. सुशीला सूद ने कहा कि मठपाल का साहित्यिक सफर हिंदी लेखन से शुरू हुआ था, लेकिन उन्होंने बाद में अपनी मातृभाषा कुमाउनी में लेखन को प्राथमिकता दी। उनका मानना था कि कुमाउनी ही उनके भावों की सशक्त अभिव्यक्ति है। उन्होंने वर्ष 1997 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद कुमाउनी साहित्य की सेवाओं में पूरी तरह से जुट जाने का निर्णय लिया।

मथुरादत्त मठपाल के पुण्यतिथि कार्यक्रम

मठपाल ने वर्ष 2000 में 'दुदबोलि' नामक पत्रिका की शुरुआत की, जो प्रारंभ में 60 पृष्ठों की त्रैमासिक पत्रिका थी और बाद में आकार में विस्तृत होकर 350 पृष्ठों की वार्षिकी बन गई। इस पत्रिका में कुमाउनी, गढ़वाली और नेपाली लोक साहित्य को विशेष महत्व दिया गया है।

हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. गिरीश चंद्र पंत ने बताया कि मठपाल की रामगंगा नदी से गहरी भावनात्मक जुड़ाव थी। उन्होंने 'चली रहप गंग हो' जैसी लंबी कविता की रचना की और अपने प्रकाशन संस्थान का नाम 'रामगंगा प्रकाशन' रखा। मठपाल ने सरकारी सहायता के बिना साहित्य सेवा को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

1989 से 1991 के बीच आयोजित क्षेत्रीय भाषायी सम्मेलनों में मठपाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने कुमाऊं में कई कवि सम्मेलनों का आयोजन किया और रामनगर में 'बसंती काव्य समारोह' के तहत कई कवि सम्मेलनों का सफल आयोजन किया।

इस विशेष कार्यक्रम में डॉ. प्रियदर्शन ने गढ़वाली भाषा में मठपाल के साहित्य पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इसके साथ ही डॉ. पी.के. निश्चल और डॉ. प्रदीप चंद ने भी अपनी बातें साझा की। इस दौरान निधि अधिकारी, आंचल, विशाल मोनिका और डिंपल ने मठपाल की कविताओं का हृदय स्पर्शी सस्वर पाठ किया।

पत्रिका के संपादक चारु तिवारी ने बताया कि इस वर्ष का अंक 'हमरि लोक-थात' शीर्षक से प्रकाशित किया गया है, जिसमें उत्तराखंड की लोक विधाओं, लोक कला, संगीत, रंगमंच, सिनेमा और अन्य तत्वों पर लगभग 20 शोधपरक आलेख शामिल हैं। अंक में झोड़ा, चांचरी, भगनौल, न्यौली एवं झुमैलो जैसे लोकगीतों की बहार भी देखने को मिली।

समारोह में कई साहित्य प्रेमी और विद्वतजन उपस्थित रहे, जिनमें नवीन तिवारी, निखिलेश उपाध्याय, सी.पी. खाती, नवेंदु मठपाल, डॉ. पी.के. निश्चल, डॉ. प्रियदर्शन, डॉ. निधि अधिकारी, श्रीमती दीपा पांडेय एवं भुवन पपनै शामिल थे।

इस कार्यक्रम ने मथुरादत्त मठपाल के योगदान को नई पीढ़ी के सामने पेश करने का कार्य किया और उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखने की प्रेरणा दी। इसके साथ ही यह कार्यक्रम कुमाउनी साहित्य में एक नया अध्याय जोड़ने का माध्यम बन गया।

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Team Amrita Bazaar Patrika - सुषमा कुमारी

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