अंकिता हत्याकांड: मैदान से लेकर पहाड़ तक सुलग गई ज्वाला और राजनीति की परतें
अंकिता हत्याकांड: मैदान से लेकर पहाड़ तक सुलग गई ज्वाला और राजनीति की परतें
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कम शब्दों में कहें तो अंकिता हत्याकांड ने न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के चित्त को एक बार फिर से झकझोर कर रख दिया है। इस घटनाक्रम ने राजनीति की कई परतें खोल दी हैं और इसके पीछे की सच्चाई को उजागर करने की मांग सशक्त हो गई है।
दिनेश शास्त्री
अविकल उत्तराखंड
देहरादून- अंकिता भंडारी हत्याकांड, जो तीन साल पहले उत्तराखंड में घटित हुआ, अब एक बार फिर सुर्खियों में है। इसे कुछ लोग 'उत्तराखंड की एप्सटीन फाइल्स' का नाम देते हुए इसकी गंभीरता को रेखांकित कर रहे हैं। इस मामले ने न केवल पार्टी की गुटबाजी को उजागर किया है बल्कि कई महत्वपूर्ण नेताओं पर यौन शोषण के आरोप लगाने का अवसर भी प्रदान किया है।
इस सब के बीच, भाजपा के निष्कासित विधायक सुरेश राठौर और उर्मिला सनावर के बीच कलह ने इस प्रकरण को नया मोड़ दिया है। उर्मिला ने कहा है कि अंकिता पर दबाव डालने वाला 'वीआईपी' कोई और नहीं बल्कि भाजपा का एक बड़ा नेता था। उसके द्वारा किए गए खुलासे ने राजनीतिक हड़कंप मचा दिया है।
अनसुलझे रहस्य और राजनीतिक दांव-पेंच
18 सितंबर 2022 को अंकिता का फोन अचानक बंद हुआ और उसके छह दिन बाद उसकी लाश ऋषिकेश के पास की चिल्ला नहर से मिली। एसआईटी की जांच में सामने आया कि किस तरह मुख्य आरोपी पुलकित आर्य ने अपने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर अंकिता पर हमला किया और उसे नहर में धकेल दिया। एसआईटी की चार्जशीट में 'वीआईपी' का जिक्र तो किया गया, लेकिन उसका खुलासा नहीं हुआ।
इस मामले की जड़ें राजनीतिक दलों में धंसी हुई हैं, जहाँ सत्ता की हनन और यौन शोषण के गंभीर आरोप संविधान के सिद्धांतों को चुनौती दे रहे हैं।
राजनीति में बढ़ी गर्मी
कांग्रेस, पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और पूर्व विधायक बिजय बड़थ्वाल ने सीबीआई जांच की मांग कर भाजपा को बैकफुट पर ला दिया है। उनके ड्रामा ने मामला गर्म कर दिया है और आम जनमानस के बीच फिर से आंदोलन शुरू हो गया है जिसमें लोग दोषियों को फांसी देने की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक दलों के इस साहसिक कदम ने इसे एक नई दिशा दी है।
इस बीच, पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को हाल ही में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, लेकिन सामाजिक संगठनों की मांग 'वीआईपी' नाम को सार्वजनिक करने की रही है। लोग समझते हैं कि यह केवल हत्या का मामला नहीं, बल्कि यौन शोषण और सत्ता के दुरुपयोग का भी मामला है।
ज्वाला उठती रहेगी
हत्याकांड की आरोपपत्र में खुलासे के बाद उर्मिला सनावर ने यह दावा किया कि राजनीतिक स्वार्थ या दबाव में जरूरी तथ्यों को नजरअंदाज किया जा रहा है। उर्मिला का पूछना यह है कि 'वीआईपी' का नाम उजागर क्यों नहीं किया गया? राजनीतिक दलों के मंथन से अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अंकिता की मौत को लेकर कई सच्चाइयां अब तक छिपी हुई हैं।
अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अंकिता भंडारी की हत्या केवल एक हत्या नहीं रह गई है, बल्कि यह यौन शोषण और राजनीतिक धृर्णा की एक नई परिभाषा को जन्म देती है। यही कारण है कि आने वाले चुनावों में यह मामला एक गर्म मुद्दा बना रहने की संभावना है।
इन सभी घटनाक्रमों से यह प्रतीत होता है कि अंकिता हत्याकांड की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है और यह मुद्दा अगली चुनावी बैठक में एक महत्वपूर्ण विषय बनेगा।
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टीम अमृत बाजार पत्रिका - [भारतीय महिला नाम]
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