उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा के लिए नवीनतम तकनीक से लैस निगरानी प्रणाली स्थापित

Aug 27, 2026 - 21:44
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उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा के लिए नवीनतम तकनीक से लैस निगरानी प्रणाली स्थापित
उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा के लिए नवीनतम तकनीक से लैस निगरानी प्रणाली स्थापित

उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा के लिए नवीनतम तकनीक से लैस निगरानी प्रणाली स्थापित

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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा हेतु राज्य सरकार ने अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली स्थापित करने के लिए कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस दिशा में महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।

देहरादून: ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न संभावित खतरों के मद्देनजर, उत्तराखंड सरकार ने उनकी सुरक्षा और निगरानी में बढ़ोतरी का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आवश्यकतानुसार ग्लेशियर झीलों की नियमित और वैज्ञानिक निगरानी के साथ-साथ संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के निर्देश दिए हैं। यह कदम राज्य में जलवायु परिवर्तन और अन्य पर्यावरणीय प्रभावों से उत्पन्न खतरों को कम करने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा।

ग्लेशियर झीलों का सर्वेक्षण और निगरानी

मुख्यमंत्री धामी ने आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन को निर्देशित किया है कि राज्य में स्थित संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का विस्तृत सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। इसमें झीलों की वर्तमान स्थिति, जलस्तर, आकार में परिवर्तन, आसपास के भू-भाग की स्थिति और संभावित जोखिम क्षेत्रों का नियमित आकलन शामिल है।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि केवल अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ग्लेशियर झीलों से संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए सभी आवश्यक सुरक्षात्मक उपायों पर कार्य किया जाना चाहिए। इसके तहत संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षित निकासी मार्गों की पहचान, संचार व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर बचाव तैयारियों को मजबूत किया जाएगा।

आधुनिक तकनीकों का समावेश

इस संदर्भ में, मुख्यमंत्री धामी के निर्देश पर उपाध्यक्ष, राज्य सलाहकार समिति, आपदा प्रबंधन विभाग, विनय रुहेला और कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी (सेवानिवृत्त) द्वारा हाल ही में नेपाल में घटित आपदा के उपरांत उत्तराखंड में होने वाली संभावित आपदाओं के संबंध में सभी जिलाधिकारियों के साथ समीक्षा की गई। बैठक में विशेष ध्यान ग्लेशियर झीलों, नदियों के जलस्तर, संवेदनशील स्थलों की निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र पर दिया गया।

जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने जनपदों में संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की नियमित निगरानी सुनिश्चित करें और किसी भी असामान्य गतिविधि की सूचना तुरंत उच्च स्तर पर दें। वर्तमान में, उत्तराखंड में कुल 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इनमें से चार का सर्वेक्षण किया जा चुका है, जबकि बाकी झीलों का भी क्रमिक सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा।

सुरक्षा उपायों पर ध्यान

विनोद कुमार सुमन ने जानकारी दी कि ग्लेशियर झीलों की निगरानी के साथ-साथ ऐसी व्यवस्थाएं विकसित की जा रही हैं, जिससे संभावित खतरे की स्थिति में चेतावनी से लेकर राहत और बचाव तक की पूरी श्रृंखला प्रभावी ढंग से काम कर सके। इसमें अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग उपकरणों की स्थापना और रियल टाइम डेटा प्राप्त करने की व्यवस्था भी शामिल है।

इसके अलावा, संभावित प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की तैयारियों को मजबूत करने के साथ-साथ स्थानीय लोगों में जागरूकता बढ़ाने की योजना बनाई जा रही है। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि स्थानीय लोग आपदा के समय अपनाई जाने वाली सुरक्षित प्रक्रियाओं को समझें और उचित तैयारी रखें।

जोखिम प्रबंधन के उपाय

विनय रुहेला ने यह भी कहा कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों के समान है और ऐसे में नेपाल में दर्ज की गई आपदा से सीख लेकर उत्तराखंड में पहले से तैयार रहना आवश्यक है। उन्होंने हिदायत दी कि प्रदेश में विभिन्न प्रकार की आपदाओं के लिए संवेदनशील स्थलों की निरंतर निगरानी की जानी चाहिए।

कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी (सेवानिवृत्त) ने आपदा प्रबंधन की स्थानीय क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आपदा के समय सबसे महत्वपूर्ण भूमिका स्थानीय प्रशासन और वहाँ के निवासियों की होती है। ऐसे में ग्राम प्रधानों और स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ मजबूत संचार व्यवस्था स्थापित करना जरूरी है ताकि किसी भी आपात स्थिति में सूचना सबसे पहले प्रभावित क्षेत्र के लोगों तक पहुंच सके।

इस प्रकार, उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा व निगरानी के लिए उठाए जा रहे कदम एक सशक्त भविष्य की ओर संकेत कर रहे हैं। समय पर चेतावनी और प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र से संभावित आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सकेगा।

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संपूर्णता के लिए, यह जानकारी पेश की गई है: टीम अमृता बाजार पत्रिका - नेहा गुप्ता

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