उत्तराखण्ड की राजनीति में दुष्यंत गौतम की चुप्पी भरी विदाई: जानें कारण
उत्तराखण्ड की राजनीति में दुष्यंत गौतम की चुप्पी भरी विदाई: जानें कारण
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कम शब्दों में कहें तो, भाजपा प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम की विदाई अचानक और चुपचाप हुई है, जो प्रदेश की राजनीतिक परिस्थिति में एक नई हलचल पैदा कर सकती है।
देहरादून। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम के गठन के साथ ही उत्तराखण्ड के प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम की विदाई भी एक चर्चा का विषय बन गई है। यह विदाई अचानक और गुपचुप तरीके से हुई है, जिसके कई राजनीतिक परिप्रेक्ष्य सामने आ रहे हैं।
टीम में बदलाव के नारों के बीच
सोमवार को नितिन नवीन ने नई टीम का ऐलान किया, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद सौंपा गया और पौड़ी गढ़वाल के सांसद अनिल बलूनी को राष्ट्रीय मीडिया संयोजक के रूप में फिर से नियुक्त किया गया। इसके अलावा, महेंद्र पांडेय को राष्ट्रीय कार्यालय का प्रभारी और आलोक भट्ट को राष्ट्रीय सोशल मीडिया सह संयोजक के रूप में नामित किया गया।
गौतम का नाम न होना बना चर्चा का कारण
लेकिन, गौतम का इस नई टीम में न होना चर्चाओं के दौर में सबसे आगे रहा। भाजपा हाईकमान ने बगैर किसी शोर-शराबे के उनकी विदाई की घोषणा की, जिससे राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे हैं। पहले से ही प्रदेश संगठन महामंत्री अजेय कुमार को राजस्थान भेजा जा चुका है।
वीआईपी मामले की छाया
गौतम और अजेय कुमार का नाम अंकिता भंडारी हत्या कांड में सामने आया था, जिससे उनकी छवि पर सवाल उठे थे। अंकिता के माता-पिता ने भी सार्वजनिक तौर पर इन नेताओं का नाम लिया था। बाद में भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर और अभिनेत्री उर्मिला सनावर की सोशल मीडिया पर बातचीत में भी इनका संदर्भ आया।
इस घटना ने भाजपा के लिए राजनीतिक संकट उत्पन्न कर दिया, जिससे पार्टी को सीबीआई जांच का सामना करना पड़ा। इस मामले ने पार्टी की छवि को आघात पहुँचाया और यह मांग उठी कि पार्टी को अपने नेताओं के संबंधों पर पुनर्विचार करना चाहिए।
चुनाव से पहले नया प्रदेश प्रभारी
दुष्यंत गौतम की विदाई के बाद, यह स्पष्ट है कि उत्तराखण्ड में जल्द ही नया प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया जाएगा। भाजपा नेतृत्व को चुनावों के लिए नए चुनाव प्रभारी की भी आवश्यकता है, ताकि पार्टी की छवि को सुधारने की दिशा में कार्यवाही की जा सके।
तीरथ सिंह रावत की वापसी
उक्त घटनाक्रम के बीच पूर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर भाजपा ने संतुलन बनाने की कोशिश की है। तीरथ रावत को पिछले साल के चुनावों के बाद वनवास का सामना करना पड़ा था।
भविष्य की राजनीतिक संभावनाएँ
भविष्य में, उत्तराखण्ड भाजपा के सामने कई राजनीतिक चुनौतियाँ हैं, और यदि नवीन नेतृत्व में पार्टी आवश्यकता के अनुसार कदम उठाती है, तो इसे फिर से मजबूती से खड़ा कर सकती है। ऐसे में दुष्यंत गौतम की अव्यवस्थित विदाई केवल एक शुरुआत हो सकती है।
अंततः, उत्तराखण्ड की राजनीति में यह बदलाव एक नई दिशा को इंगीत कर सकता है। अब देखना यह होगा कि भाजपा, अपनी नई सांस्कृतिक सेटिंग में किस प्रकार स्थानीय मुद्दों को संवोधित करती है और अपने नेताओं की छवि को कैसे फिर से बल देती है।
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सादर,
टीम अमृता बाजार पत्रिका
(राधिका शर्मा)
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