कैग की रिपोर्ट ने नमामि गंगे की विफलता को उजागर किया: उत्तराखंड में 21 STP बिना घर कनेक्शन, घाट श्मशान बंद
कैग की रिपोर्ट ने नमामि गंगे की विफलता को उजागर किया: उत्तराखंड में 21 STP बिना घर कनेक्शन, घाट श्मशान बंद
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कम शब्दों में कहें तो, नमामि गंगे योजना की स्थिति बेहद चिंताजनक है। कैग की हालिया रिपोर्ट ने कहा है कि उत्तराखंड में 21 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) घरों से जुड़े बिना ही बने हैं, जबकि अधिकांश घाटों और शवदाह घरों की स्थिति भी चिंताजनक है।
नमामि गंगे का उद्देश्य गंगा नदी का संरक्षण और इसे पुनर्जीवित करना था। इस योजना के तहत केंद्र सरकार ने पुराने और नए सभी गंगा सफाई प्रयासों को एक साथ जोड़कर एक “अम्ब्रेला प्रोग्राम” की शुरुआत की, जिसमें पुराने STP की मरम्मत, नए STP का निर्माण, घाटों और शवदाह गृहों का विकास, ठोस कचरा प्रबंधन, वनीकरण और जैव विविधता का संरक्षण जैसी गतिविधियाँ शामिल थीं। 2014 से 2023 के बीच, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) ने गंगा पुनर्जीवन से जुड़ी परियोजनाओं के लिए 14,260 करोड़ रुपये जारी किए, जिनमें से 1,149 करोड़ रुपये उत्तराखंड को मिले। इसी के मद्देनजर, सरकार ने नमामि गंगे मिशन II की मंजूरी भी दी है, जिसमें लगभग 22,500 करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है और इसका लक्ष्य 2026 तक पूरा करना है।
सात स्तर का ढांचा, लेकिन घाटे की भरपाई नहीं
गंगा सफाई के लिए 2016 में River Ganga (Rejuvenation, Protection and Management) Authorities Order और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत एक व्यवस्थात्मक ढांचा तैयार किया गया। इसमें सात प्रमुख हिस्सेदार शामिल हैं: राज्य गंगा समिति, SMCG, जिला गंगा समितियाँ, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB), शहरी निकाय, ग्राम पंचायतें और विभिन्न कार्यान्वयन एजेंसियाँ। हालांकि, कैग ऑडिट में यह पाया गया है कि SMCG अपने 13 वर्ष की स्थापना के बावजूद राज्य स्तर का नदी बेसिन प्रबंधन योजना नहीं बना सकी।
बिना कनेक्शन के खड़े STP
कैग रिपोर्ट के अनुसार, STP और अन्य सीवेज परियोजनाओं की योजना बनाते समय, स्टीट गंगा कमेटी ने महत्वपूर्ण घटकों को एक साथ समाहित नहीं किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तराखंड के सात गंगा तटीय कस्बों में स्थापित 21 STP केवल ग्रे वॉटर (रसोई और नालियों का पानी) को ट्रीट कर रहे हैं, जबकि वास्तविक सीवेज का प्रबंध नहीं किया गया।
उदाहरण के लिए, जोशीमठ में 2010 और 2017 में कुल 42.73 करोड़ रुपये की लागत से बनाई गई सीवेज प्रणाली से एक भी घर नहीं जुड़ा है। इसके परिणामस्वरूप गंगा नदी में सीधे कच्चा सीवेज गिर रहा है।
अन्य प्रमुख समस्याएं
NMCG का लक्ष्य था कि 2020 तक गंगा में कोई अनट्रीटेड सीवेज न गिरने पाए, लेकिन कैग की रिपोर्ट बताती है कि इसकी योजना अधूरी रह गई। कई गंगा तटीय कस्बों में कच्चा सीवेज अब भी नदी में जा रहा है। रिपोर्ट में STP की डिजाइन क्षमताओं के बारे में भी गंभीर खामियाँ उजागर की गई हैं। हरिद्वार-ऋषिकेश क्षेत्र के STP शुरू होते ही ओवरफ्लो हो रहे हैं।
गौचर जैसे क्षेत्र में जहां 3,930 घर हैं, वहाँ एक भी STP उपलब्ध नहीं है और लोगों को पुराने सेप्टिक सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
स्लज प्रबंधन और जल गुणवत्ता पर सवाल
कैग की रिपोर्ट ने यह भी बताया है कि ज्ञात पारिस्थितिकी और स्वास्थ्य परिणामों को नकारते हुए, किसानों को भारी धातुओं वाले स्लज का उपयोग किया जा रहा है, जिससे उनके खेतों का स्वास्थ्य संकट में है।
हरिद्वार में दो बड़े हादसे हुए हैं, जिनका सीधा संबंध सुरक्षा ऑडिट के अभाव से था। इसके अलावा, घाटों पर शवदाह गृहों की स्थिति भी नकारात्मक है, जहां स्थानीय लोग अब भी नदी के किनारे अंतिम संस्कार कर रहे हैं।
सरकारी अधूरे वादे और कार्रवाई की आवश्यकता
सरकारी पक्ष ने यह बहाना बनाया है कि संसाधनों की कमी है, लेकिन CAG ने कहा है कि बिना उचित कनेक्शन और समग्र योजना के, नमामि गंगे योजना सिर्फ ड्रेन कैचिंग प्रोजेक्ट बनकर रह गई है। रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई है कि उत्तराखंड सरकार सभी STP की सुरक्षा ऑडिट कराए और उनकी खामियों को दूर कर उन्हें प्रबंधन एजेंसियों को सौंपे।
कैग की रिपोर्ट साफ तौर पर यह संकेत देती है कि भारी बजट और घोषणाओं के बावजूद, उत्तराखंड में नमामि गंगे योजना केवल कागज पर सफल हो रही है, जबकि असली सफाई राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्थानीय भागीदारी पर निर्भर है।
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टिप्पणियां: इस रिपोर्ट को पढ़कर जो भी दर्शक अपने विचार व्यक्त करना चाहें, उनसे निवेदन है कि वे हमें लिखें। हमें आपकी राय का इंतजार रहेगा।
— सीमा कुमारी, टीम अमृता बाजार पत्रिका
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