नंदा की चौकी पुल मामले में राज्य सरकार को हाईकोर्ट से मिली राहत
नंदा की चौकी पुल मामले में राज्य सरकार को हाईकोर्ट से मिली राहत
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कम शब्दों में कहें तो, उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच की मांग को ठुकराते हुए राज्य सरकार की कार्रवाई को मान्यता दी है।
नैनीताल/देहरादून: चर्चित नंदा की चौकी पुल के ढहने के मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को राहत प्रदान की है। न्यायालय ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए सीबीआई जांच की मांग अस्वीकार कर दी। 16 करोड़ रुपये की लागत से बने इस पुल के ढहने की घटना के बाद सरकार ने पहले ही आवश्यक कदम उठाए हैं और जांच जारी है।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सोमवार को सुनी गयी याचिका पर कहा कि राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदम संतोषजनक हैं और किसी उच्चस्तरीय जांच की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा, "राज्य सरकार ने जांच शुरू कर दी है और आवश्यक कार्रवाई की जा चुकी है, ऐसे में किसी और आदेश की जरूरत नहीं।"
पुल ढहने के मामले में पहले से ही चल रही जांच
पिछले साल, 12 जुलाई को जनता के लिए खोले गए नंदा की चौकी पुल के एक हिस्से के ढहने के मामले ने सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए थे। पुल की एप्रोच रोड 28 जुलाई को भारी बारिश में धंस गई, जिसके बाद राज्य सरकार ने इस मामले में प्राथमिक जांच शुरू की। उच्च न्यायालय ने भी पहले से जारी न्यायालयीन प्रक्रिया के चलते किसी स्वतंत्र समिति गठित करने की अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।
याचिका में लगाए गए थे गंभीर आरोप
जनहित याचिका में डॉ. बैजनाथ द्वारा आरोप लगाया गया था कि पुल निर्माण का ठेका पाने वाली कंपनी का चयन संदिग्ध तरीके से किया गया। याचिका में यह भी कहा गया था कि इस ठेकाधारक का एक व्यक्ति भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष है, जिसके चलते ठेका शिकायत में धांधली के आरोपों के घेरे में आ गया।
राज्य सरकार की कार्रवाई
हाईकोर्ट में दाखिल किए गए अपने साक्ष्यों में राज्य सरकार ने बताया कि लोक निर्माण विभाग के अंतर्गत प्राथमिक जांच जारी है और तीन इंजीनियरों एवं ठेकेदार को पहले ही निलंबित किया जा चुका है। अदालत ने माना कि "राज्य ने पर्याप्त कार्रवाई की है और मामले में हैंडलिंग संतोषजनक है।"
क्या था मामला?
गौरतलब है कि 2025 में बेमौसम बारिश के चलते नंदा की चौकी पुल ढह गया था, जिसे लोक निर्माण विभाग द्वारा 16 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया था। बावजूद इसके, 2026 में इसकी एप्रोच रोड फिर से धंस गई, जिसके बारे में विपक्ष ने सरकार की नीतियों पर आक्षेप भी किया।
व्यक्तिगत आशंका पर भी उठे सवाल
याचिकाकर्ता ने यह भी चिंता जताई कि राज्य स्तर पर किसी भी अधिकारी या ठेकेदार के खिलाफ प्रभावी जांच नहीं की जाएगी। लेकिन अदालत ने इस पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। हम देख सकते हैं कि राजनीतिक और व्यावसायिक हितों के बीच खड़ी याचिका कहां तक जाती है।
अउटकम के रूप में, कोर्ट ने जनहित याचिका की कार्यवाही पूरी कर दी तथा लंबित आवेदन की स्थिति का भी निस्तारण किया। यह एक ऐसी स्थिति है, जहां उच्च न्यायालय ने राज्य के न्यायिक अनुशासन को परीक्षण में नहीं डाला है।
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संदर्भ विवरण
इस लेख को लिखा है नेहा वर्मा, Team Amrita Bazaar Patrika
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