नई कैबिनेट की घोषणा: पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में बीजेपी की नई राह
नई कैबिनेट का संदेश: धामी मजबूत, लेकिन दिग्गज गए चूक
Breaking News, Daily Updates & Exclusive Stories - Amrita Bazaar Patrika
कम शब्दों में कहें तो, हाल ही में भाजपा सरकार ने चुनावी साल में खाली पड़े मंत्री पदों पर नए नामों का ऐलान कर दिया है, जिसके साथ ही सीएम पुष्कर सिंह धामी के संभावित चुनावी चेहरे पर भी चर्चा तेज हो गई है।
भाजपा सरकार ने अंततः लंबे समय से खाली चल रहे पांच मंत्रियों की कुर्सियों पर नए नामों की घोषणा कर दी। यह घोषणा न केवल पार्टी के भीतर की चर्चाओं पर विराम लगाती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि क्या पुष्कर सिंह धामी आने वाले 2027 के चुनावों में भाजपा का चेहरा होंगे। इससे यह सिद्ध होता है कि आलाकमान ने धामी को शक्तिशाली नेतृत्व दिया है।
विभागों का बंटवारा और धामी की स्थिति
विभागों के बंटवारे ने सीएम धामी को खुली बैटिंग की छूट दे दी है। तीन दिग्गज मंत्रियों धन सिंह रावत, सतपाल महाराज और गणेश जोशी के विभागों को हल्का किए जाने का निर्णय, धामी की पार्टी और सरकार में धाकड़ और धुरंधर के रूप में पहचान को मजबूत करता है।
किसे मिला और किसे नहीं
हालांकि नए मंत्रियों की घोषणा के बाद सबसे अधिक चर्चा इस बात की हो रही है कि किन चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इनमें से तीन मंत्री कांग्रेसी गोत्र के हैं। धामी कैबिनेट में 12 में से 7 मंत्री ऐसे हैं जिन्होंने कांग्रेस से भाजपा में शामिल होकर विधायक बनने का सफर तय किया है।
अलग-अलग जिलों की स्थिति
नए मंत्रियों में से राम सिंह कैड़ा (भीमताल), भरत चौधरी (रुद्रप्रयाग), और प्रदीप बत्रा (रुड़की) कांग्रेस के पूर्व सदस्य रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि भाजपा के इन जिलों में लंबे समय से पार्टी के लिए मेहनत करने वाले नेताओं को किनारे क्यों किया गया।
दिग्गज नेताओं के नामों की अनदेखी
नैनीताल जिले से बंशीधर भगत, जो कि प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं, को मंत्री नहीं बनाया गया। इसके अलावा, रुद्रप्रयाग और चमोली के विधायक भी इस अवसर को खो चुके हैं, जबकि ये दोनों विधायक कर्ता-धर्ता रहे हैं और पार्टी के बड़े नेताओं की रैलियों में भीड़ जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर चुके हैं।
चुनावों की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण होगा कि इन क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं की नाराजगी का असर किस रूप में दिखाई देगा। कई पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि कांग्रेस से आए नेताओं के कार्य शैली में तालमेल बैठाना कठिन हो रहा है।
भविष्य की चुनौतियाँ
चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी साल में मंत्री पदों का बंटवारा संगठन और सरकार में असंतोष को कम करने के लिए किया जाता है। हालांकि, इस बार कैबिनेट का विस्तार धामी की व्यक्तिगत पसंद पर अधिक केंद्रित प्रतीत होता है।
यह सवाल उठता है कि पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच क्या मैसेजिंग की गई है और आगे जाकर वोटरों के बीच इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। पिछले चार वर्षों में मंत्रीमंडल विस्तार के टलते रहने से भाजपा के कार्यकर्ताओं में निराशा देखी गई है।
चुनाव में भाजपा के पास अब बिना पारंपरिक कार्यकर्ता आधार के भी जीतने की नई रणनीति हो सकती है, लेकिन क्या यह दीर्घकालिक रूप से सही है? यह सभी सवाल भाजपा के केंद्रीय कार्यशैली में छिपे हुए हैं। अंत में, भाजपा के लिए यह न केवल समय की मांग है बल्कि यह यह भी तय करेगा कि आने वाले चुनावों में उसका क्या भविष्य है। इसे समझना जरूरी है कि संगठन और सरकार कार्यकर्ताओं की इस नाराजगी को कैसे समझेंगी, और किस तरह से वे फिर से विश्वास स्थापित कर पाएंगी।
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सादर, टीम अमृता बाजार पत्रिका - सिमा जोशी
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