बुग्यालों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और पारंपरिक ज्ञान का मिलन आवश्यक
बुग्यालों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और पारंपरिक ज्ञान का मिलन आवश्यक
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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड में बुग्यालों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान का समुचित समन्वय अनिवार्य है।
देहरादून: उत्तराखंड में बुग्याल संरक्षण दिवस के अवसर पर मैती संस्था, यूकॉस्ट एवं हेस्को द्वारा “उत्तराखंड के अल्पाइन घास के मैदानों (बुग्यालों) का संरक्षण: वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारंपरिक ज्ञान एवं संरक्षण कार्यवाही” विषय पर एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम उत्तराखंड के बुग्यालों के पारिस्थितिकीय महत्व और उनके संरक्षण के लिए आवश्यक पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श करने के लिए आयोजित किया गया था।
सेमिनार की शुरुआत
कार्यक्रम का उद्घाटन पद्म श्री डॉ. कल्याण सिंह रावत ने किया, जिन्होंने बुग्यालों को राज्य की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए स्थानीय समुदायों की भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया। डॉ. रावत ने कहा, “बुग्याल को केवल घास के मैदान नहीं, बल्कि हमारे स्थानीय ज्ञान और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा समझा जाना चाहिए।”
विशेषज्ञों की बातें
सेमिनार के दौरान विभिन्न विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। डॉ. जी. एस. रावत, पूर्व निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने बुग्यालों के पारिस्थितिक महत्व और संरक्षण की चुनौतियों पर विशेष चर्चा की। वहीं, डॉ. गजेन्द्र सिंह, वैज्ञानिक, उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, ने वैज्ञानिक तकनीकी दृष्टिकोण से बुग्यालों के संरक्षण की संभावनाओं की जानकारी दी।
डॉ. जी. सी. एस. नेगी ने हिमालयी पर्यावरण और पारंपरिक ज्ञान पर बात की, जबकि डॉ. डी. पी. उनियाल ने बुग्याल संरक्षण में विज्ञान और तकनीक की भूमिका पर प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम में उत्तराखंड वन विभाग की अपर सचिव सुश्री कल्याणी और प्रसिद्ध फोटोग्राफर पद्म श्री अनूप साह का भी योगदान रहा।
सरकार और सामुदायिक प्रयास
कैबिनेट मंत्री श्री सुबोध उनियाल ने बुग्यालों के संरक्षण के महत्व पर जोर दिया और कहा कि “उत्तराखंड वन विभाग हर वर्ष बुग्याल दिवस मनाएगा ताकि स्थानीय लोगों को संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके।” वृक्षारोपण और संरक्षण के लिए सरकार, स्थानीय समुदायों और समाजिक संस्थाओं के समन्वय की आवश्यकता पर भी उन्होंने बल दिया।
विशिष्ट अतिथियों का योगदान
पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने हिमालय दिवस के महत्व को उजागर करते हुए जनभागीदारी की आवश्यकता की बात की। प्रो. दुर्गेश पंत, महानिदेशक, यूकॉस्ट, ने भी वैज्ञानिक नवाचार के माध्यम से बुग्यालों के संरक्षण के महत्व को साझा किया।
सम्मान और पुरस्कार
कार्यक्रम के दौरान ‘गिरि गंगा गौरव सम्मान’ और ‘मैती सम्मान’ भी वितरित किए गए। डॉ. जी. सी. एस. नेगी और प्रो. दुर्गेश पंत जैसे विशेषज्ञों को उनके क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. भवतोष शर्मा ने किया और इस अवसर पर कई गणमान्य व्यक्तियों, पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि बुग्याल केवल उच्च हिमालयी क्षेत्रों के घास के मैदान नहीं हैं, बल्कि वे राज्य की जैव विविधता, जल स्रोतों और स्थानीय संस्कृति के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि बुग्यालों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय सामुदायिक सहभागिता का सामंजस्य होना अत्यावश्यक है। सभी ने एकजुट होकर बुग्यालों के रखरखाव की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता पर सहमति जताई।
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सादर, टीम अमृता बाजार पत्रिका - प्रियंका शर्मा
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