राजी भाषा और संस्कृति: डॉ. शोभाराम की ऐतिहासिक पुस्तक का सम्मानित लोकार्पण
राजी भाषा और संस्कृति: डॉ. शोभाराम की ऐतिहासिक पुस्तक का सम्मानित लोकार्पण
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कम शब्दों में कहें तो, डॉ. शोभाराम शर्मा की पुस्तक 'राजी भाषा एवं संस्कृति' का लोकार्पण उत्तराखंड की सबसे प्राचीन जनजाति के अस्तित्व और उनके सांस्कृतिक धरोहर को बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र द्वारा आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में, उत्तराखंड की प्राचीन और विलुप्तप्राय जनजाति 'राजी' (वनरावत) के भाषाई और सांस्कृतिक इतिहास पर आधारित डॉ. शोभाराम शर्मा की महत्वपूर्ण कृति 'राजी भाषा एवं संस्कृति' का लोकार्पण किया गया। यह कार्यक्रम केन्द्र के सभागार में सम्पन्न हुआ। 2011 में उत्तराखंड में वनराजियों की जनसंख्या केवल 690 के करीब थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी भाषा और संस्कृति विलुप्त होने के कगार पर है।
भाषाई संरक्षण की आवश्यकता
कार्यक्रम में विद्वानों ने राजी जनजाति को हिमालय की प्राचीनतम 'आग्नेय' (ऑस्ट्रोएशियाटिक) सभ्यता का अंतिम अवशेष मानते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया। सभी विशेषज्ञ मानते हैं कि राजी भाषा का संरक्षण केवल एक समुदाय को नहीं, बल्कि समूचे हिमालय की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को बचाने का एक प्रयास है।
डॉ. शोभाराम की प्रेरणा
कार्यक्रम की शुरुआत 93 वर्षीय लेखक डॉ. शोभाराम शर्मा के वीडियो वक्तव्य से हुई, जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हें राजी भाषा के अध्ययन की प्रेरणा कैसे मिली। 1955 से 1961 तक उन्होंने राजी भाषा बोलने वालों के बीच गहन अध्ययन किया और 1969 में आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त की। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि राजी भाषा आग्नेय भाषा परिवार की एक महत्वपूर्ण पहचान है।
नीतिगत सुझाव
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपल्च्याल ने इस पुस्तक को अद्वितीय और अमूल्य बताया। उन्होंने विलुप्त होती भाषाओं के संरक्षण के लिए नीतिगत उपाय सुझाए और कहा कि राजियों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में दी जानी चाहिए। उन्होंने अपने विद्यार्थियों के साथ अपने अनुभव साझा कर यह बताया कि शिक्षा का माध्यम भाषा को संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
भाषाविदों की प्रतिक्रिया
प्रमुख भाषाविद डॉ. कविता रस्तोगी ने इस पुस्तक का महत्व बताते हुए कहा कि यह देश में राजी भाषा पर किया गया पहला विस्तृत भाषा वैज्ञानिक अध्ययन है। उन्होंने कहा कि डॉ. शर्मा का शोध इसमें 'आग्नेय' तत्वों की मौजूदगी की ओर इशारा करता है, जो आगे भविष्य के भाषाविदों के लिए नई बहस का अवसर प्रदान करता है।
भाषाविद डॉ. कमला पंत ने पुस्तक के मानवीय पहलुओं को उजागर करते हुए कहा कि यह एक व्याकरणिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक विलुप्त होती जनजाति की संस्कृति और भाषा का संरक्षण करने वाला ऐतिहासिक शोध दस्तावेज है।
प्रकाशन की उपलब्धता
कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार और डॉ. शोभाराम शर्मा के पुत्र अरविंद शेखर ने किया। उन्होंने बताया कि दून लाइब्रेरी की सहायता से, लगभग 60 वर्ष बाद यह मूल्यवान पुस्तक अब भाषाओं और सांस्कृतिक अध्ययन के शोधकर्ताओं के लिए सुलभ हो सकेगी।
इस आयोजन में डॉ. सुधारानी पाण्डेय, अनिल कार्की, डॉ. सुशील उपाध्याय, हयात सिंह रावत, राजेश सकलानी, ऊषा नौडियाल, रमाकांत बेंजवाल समेत कई अन्य साहित्यकार, भाषाविद, शोध छात्र, युवा पाठक और समाज के अन्य प्रबुद्ध व्यक्तित्व मौजूद थे।
अधिक जानकारी और अपडेट्स के लिए, कृपया जाएँ अमृत बाजार पत्रिका।
— टीम अमृत बाजार पत्रिका, नेहा शर्मा
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