राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम रद्द, कांग्रेस ने उठाए लोकतंत्र के सवाल
राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम रद्द, कांग्रेस ने उठाए लोकतंत्र के सवाल
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कम शब्दों में कहें तो, देहरादून में राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम प्रशासन द्वारा अनुमति न मिलने के चलते रद्द कर दिया गया है, जिस पर कांग्रेस ने विरोध जताते हुए इसे राजनीतिक निर्णय करार दिया है।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 17 जुलाई को आयोजित होने वाला कार्यक्रम 'छात्रों की गूंज' के लिए प्रशासन ने अनुमति देने से इनकार कर दिया है। प्रशासन का बयान है कि परेड ग्राउंड में पहले से एक सरकारी कार्यक्रम चल रहा है, जिससे ट्रैफिक और कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इस निर्णय के खिलाफ कांग्रेस ने सवाल उठाते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।
नगर मजिस्ट्रेट, देहरादून के द्वारा 14 जुलाई 2026 को जारी एक पत्र में बताया गया था कि 11 से 17 जुलाई तक परेड ग्राउंड में 'लोक संवर्धन पर्व' का आयोजन हो रहा है, जिसे उत्तराखंड अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ विकास निगम द्वारा संचालित किया जा रहा है। प्रशासन ने यह भी कहा कि 17 जुलाई को सप्ताहांत होने के कारण भारी भीड़ की संभावना है, जिससे ट्रैफिक और कानून-व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
इसी आधार पर कांग्रेस को परेड ग्राउंड में कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी गई है। हालांकि, प्रशासन ने कांग्रेस को गुरु नानक गर्ल्स इंटर कॉलेज और बन्नू ग्राउंड (रेसकोर्स) को वैकल्पिक स्थलों के रूप में सुझाया है। यह कदम कांग्रेस द्वारा उठाए गए लोकतांत्रिक सवालों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है।
राजनीतिक साजिश का आरोप
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस निर्णय को राजनीतिक साज़िश मानते हैं और आरोप लगाते हैं कि सरकार जानबूझकर राहुल गांधी के कार्यक्रम को रोकने के लिए दबाव बना रही है। उनका कहना है कि यह कदम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए कानूनी अधिकारों का उल्लंघन है और लोकतंत्र को चुनौती देता है।
क्यों रोका गया कार्यक्रम?
प्रशासन का मुख्य तर्क यह था कि पहले से चल रहे लोक संवर्धन पर्व के कारण कार्यक्रम के आयोजन से सुरक्षा में समस्या उत्पन्न हो सकती है। इस भेदभावपूर्ण निर्णय के खिलाफ कांग्रेस ने व्यापक रूप से विरोध प्रदर्शन करने का मन बना लिया है। पार्टी ने यह भी कहा कि यदि प्रशासन वास्तव में लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन कर रहा होता, तो इस कार्यक्रम को अनुमति दी जाती।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
कांग्रेस नेता खुद को निराश महसूस कर रहे हैं और उन्हें अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए संघर्ष करने का आश्वासन दिया गया है। वे स्थिति को और अधिक गंभीर मानते हुए, आम जनता के बीच जागरूकता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं द्वारा हर जगह विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है और उन्हें समर्थन प्राप्त हो रहा है।
इसके साथ ही, कांग्रेस ने कहा है कि वे प्रशासन के इस निर्णय के विरोध में अदालत में भी जाएंगे। इसके जरिए वे अपनी बात रखने की कोशिश करेंगे और मांग करेंगे कि उनकी आवाज़ को सुना जाए। क्या यह मामला कोर्ट में जाने को मजबूर करेगा, यह देखना दिलचस्प रहेगा।
निष्कर्ष
इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तराखंड की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ा है और यह सवाल खड़ा किया है कि क्या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन सही तरीके से किया जा रहा है? क्या सरकारी आयोजनों का हवाला देकर राजनीतिक कार्यक्रमों पर रोक लगाना सही है? यह विषय अब सियासी गलियारों में गरमागरम चर्चा का केंद्र बन चुका है।
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सादर,
टीम अमृता बाजार पत्रिका
शिल्पा मेहता
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