उत्तराखंड में तीन IPS अधिकारियों का विवादास्पद डेप्यूटेशन: राजनीति या प्रक्रिया?
उत्तराखंड में तीन IPS अधिकारियों का विवादास्पद डेप्यूटेशन: राजनीति या प्रक्रिया?
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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड के तीन प्रमुख IPS अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति ने प्रशासनिक हलकों में विवाद खड़ा कर दिया है। इस मामले को आम प्रशासनिक प्रक्रिया बताया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई कुछ और ही प्रतीत होती है।
देहरादून: उत्तराखंड के तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों, मुख्तार मोहसिन, नीरू गर्ग, और अरुण मोहन जोशी को केंद्र सरकार की एजेंसियों में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया है। हाल ही में हुए इस निर्णय को लेकर कई प्रकार के प्रश्न उठ रहे हैं। जबकि इसे एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया जा रहा है, तो सूत्रों का कहना है कि इसके पीछे नौकरशाही की डर्टी पॉलिटिक्स छिपी हुई है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों के तहत तैनाती
केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने निम्नलिखित अधिकारियों की तैनाती की घोषणा की है:
- मुख्तार मोहसिन को National Crime Records Bureau में डीआईजी स्तर पर पदस्थ किया गया है।
- नीरू गर्ग को Indo-Tibetan Border Police में डीआईजी नियुक्त किया गया है।
- अरुण मोहन जोशी को Border Security Force में डीआईजी पद पर भेजा गया है।
इन आदेशों की पुष्टि मंत्रालय द्वारा की गई है।
सोर्स के मुताबिक, आवेदन नहीं करने पर भी डेप्यूटेशन
सूत्रों की माने, इन अधिकारियों ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए स्वयं कोई आवेदन नहीं किया था। अपितु, राज्य सरकार ने उनके नाम केंद्र को भेजे थे, जिसके परिणामस्वरूप ये आदेश जारी हुए। प्रशासनिक हलकों में इसे "फोर्स्ड डेप्यूटेशन" कहा जा रहा है।
भविष्य में इन अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को लेकर मचे विवाद को ध्यान में रखते हुए, इसमें शंका की कोई कमी नहीं है। पिछली वर्ष भी इन्हें इसी कारण विवाद सामना करना पड़ा था, जब प्रतिनियुक्ति आदेश जारी होने के बावजूद उन्होंने जॉइनिंग नहीं की। इसके बाद केंद्र ने कुछ समय के लिए इन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से डिबार भी किया था।
फरवरी में, राज्य सरकार ने फिर से इन अधिकारियों के नाम केंद्रीय सरकार को भेजे, जिससे उनकी फिर से प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हुई। यह भी चर्चा में है कि इसे राजनीतिक कारणों और कुछ नौकरशाहों की व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किया गया।
तैनाती का पद स्तर और विवाद
दिलचस्प बात यह है कि इन अधिकारियों को केंद्र में डीआईजी स्तर पर तैनात किया गया है जबकि उत्तराखंड में वे आईजी स्तर की जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे थे। यह प्रशासनिक सेवा में अनियमित नहीं है, लेकिन इस स्थिति पर चर्चा बढ़ने लगी है।
विशेष रूप से चर्चा में रहे अरुण मोहन जोशी
अरुण मोहन जोशी के मामले में अधिक चर्चा हो रही है, क्योंकि वे हाल में Crime Branch CID Uttarakhand में एक संवेदनशील मामले की जांच कर रहे थे, जो नैनीताल जिला पंचायत चुनावों से संबंधित था। बताया जा रहा है कि इस मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया था। उनकी कार्यवाही ने सरकार को असहज कर दिया।
नीरू गर्ग की महत्वपूर्ण जांच
नीरू गर्ग भी अपने कार्यकाल में त्रिवेंद्र रावत सरकार के तहत कई महत्वपूर्ण जांच कर रही थीं, जिसमें SIT भी शामिल थी। उनके द्वारा की गई जांचों में कुछ सफेदपोशों का नाम था, जो अब ठंडे बस्ते में हैं।
जांच और डेप्यूटेशन का संबंध
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि अरुण मोहन जोशी से जांच हटाने और उनके तुरंत बाद भेजने की टाइमिंग पर कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ अधिकारी इसे संयोग मानते हैं, जबकि अन्य का मानना है कि यह राज्य सरकार का निर्णय हो सकता है।
IPS डेप्यूटेशन सिस्टम
भारतीय पुलिस सेवा में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया केवल उन अधिकारियों के लिए होती है जो स्वयं आवेदन करते हैं और राज्य सरकार उनकी अनुमति देकर नाम केंद्र को भेजती है। किन्तु इस मामले में ऐसा दिखता है कि अधिकारियों को इस प्रक्रिया की जानकारी ही नहीं दी गई थी।
तीन IPS अधिकारियों का केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना अभी भी विवादों में है। यह स्थिति इस बात की पक्षधर बन गई है कि सरकारी प्रक्रियाओं में कुछ पॉलिटिकल चालें भी शामिल हैं।
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सादर,
टीम अमृता बाजार पत्रिका
भव्या शर्मा
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