क्या सरकारी कार्यक्रमों में संसाधनों का अनुचित उपयोग हुआ? उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारियों की दयनीय स्थिति का खुलासा

Aug 5, 2026 - 14:44
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क्या सरकारी कार्यक्रमों में संसाधनों का अनुचित उपयोग हुआ? उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारियों की दयनीय स्थिति का खुलासा
क्या सरकारी कार्यक्रमों में संसाधनों का अनुचित उपयोग हुआ? उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारियों की दयनीय स्थिति का खुलासा

क्या सरकारी कार्यक्रमों में संसाधनों का अनुचित उपयोग हुआ?

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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड सरकार के वीआईपी कार्यक्रमों के पीछे रोडवेज कर्मचारियों की बदहाली की गंभीर तस्वीर सामने आई है। दस्तावेजों से पता चलता है कि केंद्र के दो बड़े कार्यक्रमों के लिए उत्तराखंड परिवहन निगम की बसों का इस्तेमाल हुआ, लेकिन भुगतान समय पर नहीं किया गया, जिससे कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल रहा है।

देहरादून। उत्तराखंड में हुए वीआईपी कार्यक्रमों के अंतर्गत, सरकार ने बड़ी धूमधाम से आयोजन की परंपरा को जारी रखा है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर समस्या विकसित हो रही है। रोडवेज कर्मचारियों के लिए यह सब बहुत महंगा साबित हो रहा है। उत्तराखंड परिवहन निगम की सैकड़ों बसों का प्रयोग केंद्रीय कार्यक्रमों में किया गया, लेकिन समय पर उनका भुगतान नहीं किया गया।

दस्तावेज़ों के अनुसार, 7 मार्च 2026 को आयोजित “जन-जन की सरकार, चार साल बेमिसाल” कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में कुल 299 रोडवेज बसें लगाई गईं। इसके लिए ₹1,44,02,431 का भुगतान लंबित रहा। इसके बाद, 14 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री के प्रस्तावित दौरे के लिए 255 बसों का प्रयोग किया गया, जिसका बकाया ₹1,38,18,460 था। इस प्रकार दोनों कार्यक्रमों का कुल बकाया ₹2,82,20,891 है।

फाइलें घूमती रहीं, पैसा नहीं आया

दस्तावेजों के मुताबिक, पहला पत्र संभागीय परिवहन अधिकारी ने मुख्य विकास अधिकारी को भेजा। इसके बाद, 16 मई को प्रोटोकॉल विभाग को भुगतान की कार्रवाई के लिए पत्र लिखा गया। रोडवेज कर्मचारी संघ ने 16 जून को जिलाधिकारी को चेतावनी दी कि निगम वित्तीय संकट में है।

हालांकि, 19 जून को जिला प्रशासन पूरी समस्या को शासन के प्रोटोकॉल विभाग को सौंप दिया। लेकिन 7 जुलाई 2026 को शासन के अनु सचिव ने फाइल वापस करते हुए कहा कि वर्तमान नियमावली में ऐसे भुगतान का प्रावधान नहीं है। परिणामस्वरूप लगभग चार महीने तक सरकारी दफ्तरों में फाइलें घूमती रहीं, लेकिन आवंटन का कोई निर्णय नहीं निकला।

सरकारी कार्यक्रमों से उठते प्रश्न

सबसे गंभीर तथ्य यह है कि रोडवेज कर्मचारी संघ ने पत्र में उल्लेख किया कि कर्मचारियों को अप्रैल 2025 से वेतन नहीं मिला और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बकाया भी अधित हैं। संगठन का कहना है कि आवश्यक वित्तीय प्रबंधन न होने से डीजल, लुब्रिकेंट, स्पेयर पार्ट्स जैसे खर्चे उठाना मुश्किल हो गया है।

अब सवाल उठता है: जब बसें प्रशासन की मांग पर ली गईं, तो भुगतान की व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई? यदि राज्य अतिथि नियमावली में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था, तो कार्यक्रम आयोजित करने से पहले वित्तीय स्वीकृति क्यों नहीं ली गई? चार महीनों में फाइलें चक्कर लगाती रहीं, तो जिम्मेदारी किसकी है? क्या सरकार के कार्यक्रमों का बोझ पहले से घाटे में चल रहे रोडवेज पर डालना उचित है?

निष्कर्ष

इन दस्तावेजों से केवल भुगतान लंबित रहने की कहानी ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक समन्वय की गंभीर कमी भी उजागर हो रही है। सरकारी कार्यक्रम सफल रहे, लेकिन जिन बसों ने कार्य में योगदान दिया, उन्हें समय पर भुगतान नहीं हुआ। इस लापरवाही की जिम्मेदारी कौन लेगा, यह एक बड़ा सवाल है।

इसके अलावा, यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस मामले ने उत्तराखंड की प्रशासनिक कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता को और अधिक उजागर किया है। इसके अलावा, सरकार को चाहिए कि वह अपने कर्मचारियों के प्रति जिम्मेदारी और मानवीय संवेदना दिखाएं।

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सादर,

टीम अमृता बाजार पत्रिका, सिता शर्मा

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