फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट: उत्तराखंड की आवाज़ का अंत
फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट: उत्तराखंड की आवाज़ का अंत
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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड के पूर्व नेता दिवाकर भट्ट, जिन्हें 'फील्ड मार्शल' के नाम से जाना जाता था, मंगलवार को हमेशा के लिए हमसे अलविदा हो गए। उनकी मृत्यु ने पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ा दी है।
वरिष्ठ पत्रकार दिनेश शास्त्री के द्वारा लिखित श्रद्धांजलि में दिवाकर भट्ट को राज्य आंदोलन के एक अग्रणी चेहरे के रूप में याद किया गया है। उन्हें अपने तीखे तेवर के कारण 'फील्ड मार्शल' की उपाधि दी गई थी, लेकिन उनकी अचानक मृत्यु ने सभी को अचंभित कर दिया है। आज उत्तराखंड ने एक वेक्तित्व खो दिया है जो हमेशा से पहाड़ के मुद्दों के लिए मुखर रहें।
एक संघर्षशील नेता की यात्रा
दिवाकर भट्ट का राजनीतिक करियर 1979 में उक्रांद के गठन से जुड़ा हुआ है। वे उस समूह का हिस्सा थे जो अलग उत्तराखंड की मांग कर रहा था। वे डॉ. डी डी पंत और इंद्रमणि बडोनी जैसे नेताओं के साथ उक्रांद के संस्थापक सदस्य रहे। भट्ट की सक्रियता हर महत्वपूर्ण आंदोलन में रही, चाहे वह टिहरी के खैट पर्वत पर अनशन हो या पौड़ी का आंदोलन।
राजनीतिक चुनौतियाँ और उपलब्धियाँ
उनकी राजनीतिक यात्रा कीर्तिनगर में ब्लॉक प्रमुख के पद से शुरू हुई थी, और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। राज्य आंदोलन के दौरान, वे हमेशा अग्रणी रहे और दिल्ली में भी अपनी आवाज़ को बुलंद किया। लोकगायक हीरासिंह राणा के जनजागरण गीत के बाद उन्होंने 'फील्ड मार्शल' का खिताब पाया, जिससे उन्हें और भी समर्थन मिला।
नागरिक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता
दिवाकर भट्ट ने राज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए हमेशा गंभीरता से मुद्दों को उठाया। उन्होंने देखने वाले नागरिकों की आवाज को सुनने की ज़रूरत को समझा। उनकी सक्रियता ने उन्हें एक प्रभावशाली नेता बना दिया, जिनकी आवाज़ राज्य के हितों के लिए हमेशा मुखर रही।
उत्तराखंड की उपेक्षा पर आक्रोश
भट्ट की कमी आज हर क्षेत्र में महसूस की जा रही है। उत्तराखंड के मुद्दों जैसे सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाना या किसी योजना को लागू करने की प्रक्रियाओं को लेकर वे हमेशा मुखर रहे। उनकी सक्रियता ने राज्य स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव लाने में योगदान दिया है।
उनका उत्तराधिकार
दुर्भाग्य से, वर्तमान में उक्रांद संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। पार्टी नेताओं को दूसरी पंक्ति खड़ी करने में देर हुई है। अब जब कुछ नए चेहरे आगे आए हैं, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वे दिवाकर भट्ट के अधूरे कामों को पूरा करने का प्रयास करेंगे।
उत्तराखंड में आज दिवाकर भट्ट को उसी समर्पण के साथ याद किया जा रहा है, जिस समर्पण के साथ उन्होंने अपनी आवाज़ उठाई थी। उनके द्वारा किए गए संघर्षों की याद दिलाई जाती है, और उनकी कमी को हमेशा महसूस किया जाएगा। उनकी आत्मा को शांति मिले।
अंत में, हम आह्वान करते हैं कि उनके द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलकर हम उनकी मेहनत और संघर्ष को सहेजने का प्रयास करें। दिवंगत नेता को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।
इस लेख को पढ़ने के लिए धन्यवाद। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें.
सादर,
टीम अम Rita Bazaar Patrika
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