भरणपोषण अधिनियम के तहत बुजुर्ग दंपति और उनके बेटे-बहू में बजी सुलह की घंटी

Oct 6, 2025 - 07:44
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भरणपोषण अधिनियम के तहत बुजुर्ग दंपति और उनके बेटे-बहू में बजी सुलह की घंटी
भरणपोषण अधिनियम के तहत बुजुर्ग दंपति और उनके बेटे-बहू में बजी सुलह की घंटी

भरणपोषण अधिनियम के तहत बुजुर्ग दंपति और उनके बेटे-बहू में बजी सुलह की घंटी

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कम शब्दों में कहें तो, जिलाधिकारी सविन बंसल की समझदारी ने एक टूटते परिवार को पुनर्मिलन के लिए प्रेरित किया, जिससे बुजुर्ग दंपति और उनके बेटे-बहू के बीच सुलह हो गई।

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। जिले के खुड़बुड़ा निवासी 70 वर्षीय बुजुर्ग दंपति जसवंत सिंह और उनकी पत्नी ने हाल ही में अपने बेटे व बहू के खिलाफ घर से बेदखली का मामला दर्ज कराया था। यह मामला कुछ ही दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट न्यायालय में भरणपोषण अधिनियम के तहत दायर किया गया था। इस गंभीर मामले की सुनवाई के दौरान, जिलाधिकारी सविन बंसल ने मामले की गहराई को समझा और परिजनों के बीच उत्पन्न मनमुटाव को सुलझाने का कार्य किया।

परिवारिक संबंधों की मजबूती का संदेश

जिलाधिकारी सविन बंसल ने दो सुनवाई में ही परिवारिक संबंधों की अहमियत पर जोर दिया। उन्होंने बुजुर्ग दंपति से अपील की कि वे अपने बेटे और बहू को बेदखल न करें, यहां तक कि उनके तीन नाबालिग बच्चे भी इस संकट का हिस्सा हैं। साथ ही, उन्होंने बेटे-बहू को बुजुर्गों के प्रति अपने कर्तव्यों का स्मरण कराया, ताकि परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार बन सकें।

बुजुर्गों के प्रति सम्मान का महत्व

जिलाधिकारी ने कहा कि बुजुर्ग माता-पिता और आर्थिक रूप से कमजोर बेटे-बहू एक-दूसरे के लिए एक महत्वपूर्ण सहारा हैं। उन्होंने परिवार में प्यार, सम्मान और सहयोग की संस्कृति को कायम रखने का आग्रह किया, जिससे परिवारिक सौहार्द बना रहे। यह सिर्फ परिवार की भलाई के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता के लिए भी आवश्यक है।

बुजुर्ग दंपति के चार पुत्र हैं, जिनमें से दो अपने-अपने परिवारों के साथ अलग रहते हैं। एक बेटा दिव्यांग है, जबकि दूसरे बेटे बंसी की आर्थिक हालत कमजोर है। उनका कपड़ों का छोटा व्यवसाय है और उनके तीन नाबालिग बच्चे हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए, जिलाधिकारी ने बुजुर्ग दंपति को अपने बेटे-बहू और नौनिहालों को घर से न निकालने की सलाह दी है।

प्रशासन की भूमिका

जिलाधिकारी ने यह भी बताया कि प्रशासन इस मामले की नियमित मॉनिटरिंग करेगा, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि परिवार में सौहार्द बना रहे। यह प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे मामलों में दखल दें ताकि परिवार की एकता को बनाए रखा जा सके।

इस अद्भुत पुनर्मिलन की कहानी से यह सीख मिलती है कि परिवारिक विवादों को संवाद और समझदारी से सुलझाया जा सकता है। पारिवारिक बंधनों को तोड़ने की बजाय, उन्हें सशक्त करना हमारी जिम्मेदारी है।

परिवार एक मजबूत संस्था है, और इसका महत्व समय-समय पर हमारे सामने आता है। बुजुर्गों की देखभाल और सम्मान करना आवश्यक है।

इस प्रकार, यह समझदारीपूर्वक सुलह एक उदाहरण है कि कैसे सामाजिक-मात्रिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए एक परिवार को नई दिशा दी जा सकती है।

इस स्थिति में फिर से परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और सम्मान को बढ़ावा दिया गया है। आगे भी ऐसे कई मामलों में जिलाधिकारी जैसे सक्षम अधिकारी सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।

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सादर,

टीम अमृता बाजार पत्रिका, सुमन शर्मा

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