‘बड़ी आई पत्रकार’ : खबर लहरिया की अनसुनी दास्तान
‘बड़ी आई पत्रकार’ : खबर लहरिया की अनसुनी दास्तान
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कम शब्दों में कहें तो, 'बड़ी आई पत्रकार' किताब उस अद्भुत यात्रा का वर्णन करती है, जिसमें महिलाओं ने पत्रकारिता की दुनिया में अपनी अनोखी पहचान बनाई।
बिहार के भोजपुर क्षेत्र में दो विधानसभा क्षेत्रों ‘सहार’ और ‘संदेश’ की कहानी से शुरू करते हैं। जब चुनाव 1995 में हुए, तो पहली बार इन क्षेत्रों में मतदाता अपनी आवाज उठा सके। वस्तुतः यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव था, जब यहां की पिछड़ी और दलित जमात ने मतदान किया। परिणामस्वरूप, भाकपा (माले-लिबरेशन) के प्रमुख प्रत्याशियों ने चुनाव जीते। तभी यह स्पष्ट हो गया था कि सामाजिक चेतना और राजनीतिक भागीदारी में एक नए युग की शुरुआत हो रही है। उस समय कुछ ऐसा ही ‘खबर लहरिया’ का सपना भी बुंदेलखंड के गांवों में उग रहा था।
‘खबर लहरिया’ की स्थापना 2002 में हुई थी, जब उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में महिलाएं अपने अनुभव, संघर्ष और विचारों को साझा करने एवं अपनी आवाज को समाज के सामने लाने का फैसला करती हैं। ये महिलाएं उस समय शिक्षा और संवाद के विकास से दूर थीं, परंतु उन्होंने सोचा कि क्यों न एक ऐसा अख़बार निकाला जाए जो उनके मुद्दों, उनकी आवाज़ को उठाए। इस संकल्प ने ‘खबर लहरिया’ के स्वप्न को जन्म दिया।
कभी हाथ से लिखे गए और साइकलोस्टाइल करके बांटे गए इस अख़बार ने जल्दी ही डिजिटल न्यूज़ चैनल का रूप धारण कर लिया। यह इस बात की प्रमाण है कि महिलाएं कैसे पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर अपने अनुभवों को दुनिया के सामने लाने में सफल हुई हैं। ‘बड़ी आई पत्रकार’ किताब, खबर लहरिया टीम की यात्रा को संदर्भित करती है, जिसमें उनके व्यक्तिगत अनुभव व समानांतर चुनौतियों का भी समावेश है।
इस किताब की लेखिकाओं में दिशा मालिक, गीता देवी, हर्षिता वर्मा, कविता बुंदेलखंडी, लक्ष्मी शर्मा, ललिता, मीरा देवी, नाज़नी रिज़वी, श्यामकली और सुनीता प्रजापति का नाम शामिल है। ये सब मिलकर अपनी दास्तान को बताती हैं, जब किसानों से लेकर बाजारों तक उनकी आवाज़ गूंजती है। रोहिणी मेनन की टिप्पणी जैसी आक्रामकता इस किताब की पहचान बन गई है, "ये महिलाएं बेहिचक अपनी बात रखती हैं, ये बड़े पत्रकारों को चुनौती देती हैं।"
किताब में पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं और अनुभवों का दिलचस्प विवरण दिया गया है। इसकी अध्यायों में 'पत्रकारिता का बिजनेस', 'हमारी ईंट-हमारा गारा', और 'ग्रामीण पत्रकारिता का मज़ा' शामिल हैं। महिलाएं न केवल अपनी यात्रा का विवरण देती हैं, बल्कि अपने उन अनुभवों को साझा करती हैं जिनसे उन्होंने संघर्ष किया, अपने डर को पराजित किया और फिर से खुद को स्थापित किया।
यह किताब न केवल महिलाओं की संघर्ष की कहानी है, बल्कि उन सभी पत्रकारों के लिए प्रेरणा भी है, जो एक बेहतर पत्रकार बनने का प्रयास कर रहे हैं। ‘बड़ी आई पत्रकार’ लॉन्च होने वाली यह किताब वास्तव में उन महिलाओं का समर्पण है, जिन्होंने न केवल पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा बल्कि इसे संवेदनशीलता और धैर्य के साथ संरक्षित भी किया।
किताब की रिहाई 399 रुपए मूल्य पर दिल्ली में हुई है, और यह Amazon पर भी उपलब्ध है। यह हिन्दी एवं अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है, हालांकि इसका हिन्दी शीर्षक अधिक प्रभावशाली लगता है।
इस प्रकार, ‘बड़ी आई पत्रकार’ केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह एक सामूहिक अनुभव और समझता है कि कैसे महिलाएं पत्रकारिता के माध्यम से अपनी आवाज़ को व्यक्त करती हैं। इसके द्वारा वे उन रूढ़ियों को तोड़ती हैं जो सदियों से उनके मार्ग में खड़ी थीं।
अंत में, यह कहना महत्वपूर्ण है कि यह दास्तान हमें यह सिखाती है कि किसी भी क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए साहसिकता और इच्छाशक्ति आवश्यक होती है। इस अनसुनी कहानी ने हमें प्रेरित किया है कि हम अपने विचारों और आवाज़ों को पहचानें।
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Team Amrita Bazaar Patrika
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